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आजादी के बाद पहले चुनाव में बेनीपुरी थे प्रत्याशी और सक्रिय थे कानफुंकवा गुरु, इन्होंने फिर दिखाई ताकत https://ift.tt/2U2hT3x

कलम के जादूगर रामवृक्ष बेनीपुरी ने सोशलिस्ट पार्टी से जब पहली बार चुनाव लड़ा तो उनकी हार हुई थी। आजादी के बाद पहले चुनाव में कानफुंकवा सक्रिय थे। इसे ही वे अपनी हार का अहम कारण मानते हैं। इस विधानसभा चुनाव में भी कानफुंकवा पूरी तरह सक्रिय रहे। येन केन प्रकारेण अपनी जीत निश्चित करने की जुगत हावी दिखी। जाति – पाति, पार्टी का भीतरघात, धनबल और वर्चस्व से लेकर राजनीति के हर दांव – पेंच ने अपना रंग दिखाया है।

बेनीपुरी मानते हैं कि उस वक्त भी जाति के हिसाब से चुनाव लड़ा जा रहा था। वे अपनी डायरी में लिखते हैं - एक गांव में जब मैं रात में पहुंचा तो देखा कि जातियों के गुरु गुसाईं दरवाजे – दरवाजे घुमाए जा रहे हैं और बूढ़ा महंथ हाथ जोड़कर लोगों से वोट की भिक्षा मांग रहा है। कानफुंकवा गुरुओं की देहात में बड़ी कद्र है। उन्हीं के कंधे पर लोगों को वैतरणी पार करनी है।
घरों से घूंघट में निकली बहुरिया, दिखाया मतदान के प्रति उत्साह

औराई विधानसभा में वोटिंग के लिए बहुएं घूंघट की आड़ लेकर घरों से बूथ तक पहुंचीं। पूरे उत्साह के साथ वोटिंग की। बेनीपुर गांव में भी महिला वोटरों की संख्या और बूथ पर उनकी उपस्थिति अच्छी-खासी और एक अर्थ में पुरुष वोटरों से सशक्त हो कर दिखीं। बेनीपुरी अपने संस्मरण में पहले चुनाव को याद कर लिखते हैं कि... सबसे तो मुग्ध करने वाला था स्त्रियों का उत्साह।

मेरे गांव में तो पुरुष वोटरों की अपेक्षा स्त्री वोटरों की संख्या अधिक है। उसमें से कुछ वृद्धा और कुछ बिल्कुल बहुरिया हैं। किंतु वे सब की सब एक ही साथ जोश से निकलीं और जब वे कतार में बाहर हुईं तो यह दृश्य देखने ही लायक था। असल में पोलिंग में रंगीनी आती स्त्रियों से है। जब रंग-बिरंगी साड़ियों में निकली तो आंखें तृप्त हुईं। डेढ़ मील पर पोलिंग थी तब भी वे पैदल ही गईं।



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In the first election after independence, Benipuri was a candidate and Kanfunkwa Guru was active, he again showed strength


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