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जातीय दुष्चक्र की कड़ाही में खाैलता रहा है मधेपुरा, अब भी पिछड़ापन क्षेत्र की पहचान https://ift.tt/3517s6C

मधेपुरा में कभी एक नारा था...‘रोम पोप का, मधेपुरा गोप का’। यही जातीय गणित यहां राजनीति का आधार भी बनता रह। लालू से शरद यादव तक ने यहां का प्रतिनिधित्व किया। विकास को रेल स्लीपर फैक्ट्री व इलेक्ट्रिक रेल इंजन कारखाना से गति देने की कोशिश हुई पर इलाका बेपटरी ही रहा। रेल स्लीपर कारखाना खुला पर आज तक एक भी स्लीपर बना नहीं। इसी तरह इंजन कारखाना खुला। बेहतर होता कि उससे जुड़े पार्ट पुर्जे का उत्पादन स्थानीय स्तर पर होता लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हां, आसपास की जमीन की कीमत जरूर बढ़ गई।
खेत सामर्थ्यवान तो हैं लेकिन मंडी तक पहुंचने और उचित मूल्य नहीं मिल पाने की वजह से किसान कराहते रहते हैं। जिले में मक्के का उत्पादन गेहूं से दोगुना होता है। गन्ने के लिए भी यहां की मिट्‌टी बेहतर है। ये तीन फसल और इन पर आधारित उद्योग अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। लेकिन गुड़ की पेराई से ज्यादा जमीन पर कुछ है भी नहीं।

ये विडंबना ही तो है कि हमारे यहां खेतों के मालिक किसान पंजाब-हरियाणा में मजदूरी कर रहे हैं। लेकिन चुनाव में ये मुद्दे हवा हैं। जातीय गोलबंदी ही परिणाम तय करेगी यह तय है। जिले से गुजरने वाले एनएच गड्‌ढे में हैं। दो साल पहले की बात है। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एपी शाही को एनएच 106 से गुजरना पड़ा।

उस वक्त चीफ जस्टिस ने कहा था कि, मैंने तो किसी तरह वैतरणी पार कर ली। बाद में हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया। जनहित याचिका भी दायर हुई। कोर्ट निर्माण की निगरानी कर रहा है बावजूद आज तक 30 फीसदी ही काम हो पाया है जबकि अक्टूबर में इसे पूरा हो जाना था।

आलमनगर: यहां का आधा हिस्सा बाढ़ प्रभावित है। सड़कें बदहाल हैं, शुद्ध पानी सपना है। हां, एक बात है कि इलाका बाढ़ में डूबा रहे तब भी बिजली रहती है। मोबाइल चार्ज हो जाता है तो दुनिया से जुड़े रहते हैं। लगातार जीत रहे मंत्री नरेंद्र ना. यादव के सामने राजद से पहली बार लड़ रहे ई. नवीन निषाद हैं। कड़ी टक्कर है। नवीन के पास खोने को कुछ नहीं है। पर जदयू के असंतुष्ट वोटर, लवली के राजद में आने के बाद राजपूत और भाजपा माइंड के ब्राह्मण वोटर और नवीन की जाति निषाद वोटरों की एकजुटता मंत्री जी का खेल बिगाड़ भी सकती है।

बिहारीगंज: यहां से सर्वाधिक 22 उम्मीदवार हैं। जदयू के विधायक निरंजन मेहता दूसरी बार मैदान में हैं। कांग्रेस से शरद यादव की बेटी सुभाषिनी हैं। पूर्व मंत्री रेणु कुशवाहा के पति विजय सिंह कुशवाहा लोजपा से ताल ठोक रहे हैं। राजद के बागी और पप्पू यादव के जाप के ई. प्रभाष इस सीट के गुणा-गणित को उलझा रहे हैं। सीट नहीं मिलने की नाराजगी भाजपा में है और स्थानीय स्तर पर भी इसका असर दिख रहा है। निरंजन मेहता को जहां जदयू-भाजपा के वोटरों का भरोसा है तो सुभाषिनी को महागठबंधन के आधार वोटर और पिता शरद यादव की राजनीतिक-सामाजिक कमाई का सहारा है।
सिंहेश्वर: ये सुरक्षित सीट है। क्षेत्र से डॉ. रमेश ऋषिदेव मंत्री हैं। वे क्षेत्र में घूम-घूमकर विधायक फंड से बनवाई सड़कें गिनवा रहे हैं, नीतीश-मोदी का चेहरा दिखा रहे हैं। लेकिन कई इलाकों में विकास कार्यों के मामले में उपेक्षा को लेकर सवालों से जूझना पड़ रहा है। भितरघात की भी आशंका है। चिराग को लेकर भाजपा के पारंपरिक वोटरों में भी कई जगह दुविधा वाली स्थिति है। सामने राजद से चंद्रहास चौपाल हैं। इन्हें कुछ ही समय पूर्व भाजपा ने छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित किया था। महागठबंधन के आधार वोट के साथ जाति के वोटरों को वे रिझाने में जुटे हैं। मुकाबला कड़ा बना हुआ है।

मधेपुरा: पहली बार सियासी विरोधी प्रो. चंद्रशेखर और जाप प्रमुख पप्पू यादव मैदान में हैं। ये यादव बहुल क्षेत्र है। सीट राजद के पास है। जीते तो चंद्रशेखर हैट्रिक लगाएंगे। जदयू के प्रदेश प्रवक्ता निखिल मंडल भी हैं। महागठबंधन का आधार कुनबा आक्रामकता के साथ एकजुट दिख रहा है। जदयू के वोटर स्थिर हैं जबकि भाजपाई दुविधा में हैं। पप्पू देर से यानी 4 को मधेपुरा पहुंचे। प्रचार की कमान कार्यकर्ताओं के हाथ में थी। लोस चुनाव में हार के बाद पप्पू के लिए यह चुनाव अहम है। लोजपा से उद्दमी साकार यादव भाजपा वोटरों में सेंधमारी में लगे हैं।



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एनएच 107 की बदहाल तस्वीर।


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