उस दिन बहुत तेज बारिश हो रही थी। सतीश कुमार अपने बेटे बसंत के साथ लगातार खेत में धान की रोपनी का काम किए जा रहे थे। थक जाने के बावजूद भी बसंत डटा था। पिता बार-बार कह रहे थे कि बेटा जा थोड़ा आराम कर ले। आजकल तो तुम देर रात तक पढ़ाई भी करते हो। अगले मार्च में दसवीं की बोर्ड परीक्षा भी है। बसंत का मन था कि जल्दी से छुट्टी मिल जाए ताकि वह घर जाकर पढ़ाई कर सके। लेकिन, वह अपने पिता को अकेले काम करते हुए छोड़कर जा भी तो नहीं सकता था।
शाम ढलने तक पिता-पुत्र काम करते हैं और थकान से चूर होने के बावजूद घर आते ही बसंत पढ़ाई में लीन हो जाता है। बिहार के गया जिले के एक सुदूरवर्ती गांव में रहने वाले बसंत को बचपन से ही पढ़ने का बड़ा शौक था। पिता भी कहते थे कि बेटा पढ़। मेरे पास बहुत थोड़ी सी जमीन है। अगर एक साल भी फसल नहीं हुई तो भुखमरी का सामना करना पड़ेगा। तुम्हारे 5 भाई-बहनों के साथ-साथ दादा-दादी की भी जिम्मेदारी मुझ पर ही है। इसलिए बेटा जितना हो सके उतनी मेहनत कर। बचपन से ही उसके मन में यह बात बैठ गई कि उसे खूब मेहनत करनी है।
पास के ही सरकारी प्राथमिक विद्यालय से बसंत ने पढ़ाई शुरू की। पिता जब भी खेतों से काम करके आते बसंत के पास बैठ जाते थे और बगल में बसंत बैठकर पढ़ता रहता था। देर रात में बसंत जब तक पढ़ता रहता, पिता पास ही बैठे रहते थे। बैठे-बैठे उनको कब नींद आ जाती पता भी नहीं चलता था। अब बसंत का हाई-स्कूल में जाने का समय आ गया था। गांव के आप-पास कोई सरकारी स्कूल नहीं था। लगभग सात किलोमीटर दूर बसंत एक सरकारी स्कूल में पढ़ने जाने लगा।
मेहनत के दम पर स्कूल में भी बसंत ने अपनी एक अलग पहचान बना ली। शिक्षक भी उसे बहुत प्यार करने लग गए। पढ़ने के लिए सीनियर स्टूडेंट्स से कुछ पुरानी किताबें भी दिलवा देते थे। बड़ा जीवट वाला विद्यार्थी था बसंत। स्कूल के लिए प्रत्येक दिन पैदल ही सात किलोमीटर जाता और वापस आता था। जिस दिन स्कूल में छुट्टी होती थी, खेत में पिता के साथ कुछ न कुछ काम जरूर करता था। कभी-कभी तो काम अधिक होने पर स्कूल तक छोड़ देता था।
बसंत बताता है कि उसे अच्छा नहीं लगता था कि उसके पिता अकेले ही सिर पर बोझ उठाएं या फिर और भी कोई काम करें। इन तमाम मुश्किलों के बावजूद बसंत पढ़ाई में कोई कमी नहीं छोड़ता था। दसवीं की परीक्षा के कुछ दिनों पहले तक भी उसने पिता के साथ काम किया। उसे अपनी मेहनत पर पूरा विश्वास था। उसका यकीन सच साबित हुआ। बहुत ही अच्छे अंकों से उसने दसवीं की बोर्ड परीक्षा पास की। माता-पिता भी बहुत खुश थे। उस समय सुपर 30 की चर्चा उसके गांव तक पहुंच चुकी थी।
उसे पूरा भरोसा था की उसका चयन सुपर 30 में हो जाएगा और वह आईआईटी तक की यात्रा पूरी कर लेगा। पूरी तरह से ग्रामीण दिखने वाले बसंत के आत्मविश्वास को देखकर मैं भी अचंभित हो गया। अब वह सुपर 30 का हिस्सा बन चुका था। आईआईटी प्रवेश-परीक्षा के दिन जब वह आशीर्वाद लेने आया तब उसके सिर पर एक गमछा बंधा था। मुझे आज भी याद है कि उसके उत्साह को देखकर मुझे बहुत खुशी हो रही थी। जब उसका रिजल्ट आया तो वह अच्छी रैंक के साथ पास हुआ। उसका एडमिशन आईआईटी भुवनेश्वर में हो गया। उसकी एक बड़ी कंपनी में नौकरी लग गई है।
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