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मां सिलाई कर घर का खर्च चलाती थी, बेटा आईआईटी दिल्ली से बना इंजीनियर https://ift.tt/35kqntY

समय रुकता ही नहीं है। बस चलता रहता है। और इस समय के साथ जीवन भी चलता रहता है। रास्ते में बहुत सारी रुकावटें और बाधाएं मिलती हैं। इन बाधाओं को मजबूती के साथ जो पार करता है वही विजेता बनता है। पिछले 18 साल के सुपर 30 के इतिहास में मैंने भी बहुत उतार चढ़ाव देखे हैं। जहां मुझे बहुत प्यार और सम्मान मिला वहीं बहुत मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा लेकिन, मुझे अंत में खुशी मिली और उस खुशी का मुख्य कारण थे हमारे पास हर साल आने वाले 30 बच्चे।

आज तक सैकड़ों ऐसे बच्चे मेरी जिंदगी से गुजरे हैं जिन्होंने तमाम मुश्किलों के बावजूद अपना एक मुकाम हासिल किया है। सबसे बड़ी बात है कि ऐसे बच्चे मुझे कभी भूले नहीं। हमेशा मेरा हाल पूछते रहते हैं। यही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। हां, कुछ बच्चे ऐसे भी आए जिनमें कुछ समय के लिए भटकाव आ गया लेकिन, बाद में वो भी मेरे पास आए और उनसे बहुत करीब के दिल के रिश्ते बने। आज ऐसे ही एक बच्चे की कहानी आपको बता रहा हूं।
लगभग 13 साल पहले की बात है। आईआईटी की प्रवेश परीक्षा के नतीजे आए थे। सुपर 30 के परिसर में खुशियों का माहौल था। इस बार भी नतीजे बेहतर रहे थे। 30 में से 28 विद्यार्थियों का चयन हुआ था। उस साल डिस्कवरी चैनल पूरे एक साल हम लोगों के साथ था। वे इसी बैच के आधार पर फिल्म बना रहे थे। प्रणव प्रिंस भी इनमें से एक था। वह बेहद निर्धन पारिवारिक पृष्ठभूमि से था।

उसके पिता बेरोजगार थे और परिवार के भरणपोषण का जिम्मा मां पर था, जो सिलाई करके घर चलाती थीं। उसके सपने बड़े थे और वह इंजीनियर बनना चाहता था। एक साधारण सरकारी स्कूल से पढ़ाई हुई थी। बारहवीं बहुत ही अच्छे अंकों से पास किया था। ट्यूशन और कोचिंग के लिए पैसे नहीं थे। चूंकि वह पटना में ही रहता था, उसे सुपर 30 के बारे में जानकारी थी। इंट्रेंस टेस्ट दिया और सुपर 30 का हिस्सा बन गया।

उसकी मेहनत और प्रतिभा से सुपर 30 के सभी बच्चे बहुत ही प्रभावित थे। फिजिक्स ओलिम्पियाड में भी उसने बहुत अच्छा किया था। आईआईटी जेईई के रिजल्ट के दिन तो उसने कमाल ही कर दिया। उसकी 162वीं रैंक आई थी। दाखिले के पहले सारे विद्यार्थी अपने घर लौट रहे थे। यह सिर्फ उनका ही सपना नहीं था। उनके माता-पिता भी बड़ी आस लगाए थे। अचानक कुछ ऐसा हुआ कि सुपर 30 के दरवाजे पर ताला लटक गया। सारी खुशियां मायूसी में बदल गईं।
कोचिंग के कारोबारियों ने प्रणव को अपने जाल में फंसाया। उसे लालच देकर अपने विद्यार्थी के रूप में सम्मानित और प्रचारित कर दिया, जबकि वह पूरे समय उन तीस विद्यार्थियों के साथ ही पढ़ा, जो उस साल के सुपर 30 के बैच में शामिल थे। डिस्कवरी चैनल के एक साल की शूटिग में वह पूरे साल दिख रहा था। प्रणव के कदम ने मेरे सपने को तोड़ दिया। गरीबी के गर्त में पड़े प्रतिभाशाली बच्चों को उनकी काबिलियत के मुताबिक सही मंजिल तक पहुंचाने में हम सिर्फ निमित्त भर थे। मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि कोई ऐसा भी कर सकता है।

भावुक मन से मैंने सुपर 30 को बंद करने का निर्णय लिया। इस पर बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई। मीडिया ने सवाल पूछे। छात्र संगठनों ने प्रदर्शन तक किए और सुपर 30 फिर से शुरू करने का अाग्रह किया। प्रणव को शायद इसकी उम्मीद नहीं रही होगी कि बात यहां तक बढ़ जाएगी। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह आया।

उसने रोते हुए कहा कि बंद करने का फैसला मत लीजिए वरना मैं आईआईटी में एडमिशन नहीं लूंगा। उसने सबके सामने सच स्वीकार किया। फिर सब कुछ अपनी रफ्तार पर आ गया। दिल्ली आईआईटी में उसका दाखिला हुआ। वह पढ़ते हुए जब भी पटना आता, सुपर 30 के अगले बैचों में पढ़ाना नहीं भूलता था। आज वह एक नामी कंपनी में दुबई में इंजीनियर है। मेरे पिता जी हमेशा मुझसे कहा करते थे। कर भला, हो भला।



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Mother used to run the household expenses by sewing, son engineer made from IIT Delhi


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